बेहतर कौन: बच्चे या सांसद

नोटबंदी पर गर्मायी राजनीति के चलते पूरे शीतकालीन सत्र के दौरान संसद के दोनों सदनों में सिवाय हंगामें और नारेबाजी के कोई काम नहीं हो पाया। क्या भारतीय राजनीति इस हद तक गिर गई है कि इसे संसद के मान और मर्यादा का ख्याल तक नहीं है। संसद के एक सत्र में करोडों का खर्च आता है और ये सारा पैसा किसी सांसद की जेब से नहीं जाता। जाता है तो जनता की जेब से। संसद के इस सत्र में शायद ही कभी 50 प्रतिशत सांसद उपस्थित रहे हों और उपस्थित सदस्यों ने पूरे सत्र में हंगामें और नारेबाजी के अलावा कोई और काम नहीं किया हो लेकिन फिर भी वे अपने पूरे कार्यकाल में संसद में आ सकते हैं और हंगामा कर सकते हैं। उनपर लगाम लगाने के लिए कोई नियम नहीं है।
एक सांसद यदि संसद में उपस्थित नहीं होता है तो उसपर किसी भी प्रकार के जुर्माने या सजा का प्रावधान नहीं है लेकिन यदि किसी छात्र की उपस्थित स्कूल में कम हांे तो वह परीक्षा में नहीं बैठ सकता................. क्यों..? क्या इसका जवाब किसी राजनेता के पास है ?
इस सत्र के दौरान हमारे लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों की उद्दण्डता, मानसिकता और गैर जिम्मेदाराना रवैये को देखकर मुझे अपने सरकारी विद्यालयों के कक्षा 5 में पढ़ने वाले बच्चे भी इनसे कहीं ज्यादा बेहतर लगे जो कि चिल्लाते है, बदमाशियां करते हैं लेकिन अपने अध्यापक के कहने पर ना सिर्फ चुप ही होते हैं बल्कि अपना काम भी पूरा करते हैं।
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